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वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नही है थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नही है थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का, सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का। एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ; वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का। आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है; थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है। दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा, लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा। जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही, अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा। और अधिक ले जाँच, देवता इतन क्रूर नहीं है। थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

About June 13, 2009

I am for following purpose:-

1. To share my knowledge with world.

2. To connect myself to the whole universe

3. To know the view of public on certain issues, which often ellude me…

4. njoy this opportunity.

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4 Responses to “About”

  1. Anurag Says:

    Hi,

    There is a broken url in your blog, can u please correct it ?
    please update Anurag Gautam urls as http://www.anuraggautam.com as i have shifted my domain. That is in your Young World section

  2. yunzhi Says:

    Just curious, what does “वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नही है थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नही है थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का, सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का। एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ; वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का। आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है; थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है। दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा, लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा। जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही, अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा। और अधिक ले जाँच, देवता इतन क्रूर नहीं है। थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।” mean? Thank you!

    • whoami Says:

      this is an inspirational poen by RamDhari Singh dinkar. This poem tell that “hey brother donot stop after being tired, destination is not far off. The poet tries to put enthusiasm in the person by telling him inspirational things” The theme is that people generally stop at last moment , when they have almost reached the destination.The poet tells them to not stop because the person is almost close and if he/she stops there the person is not a true hero.

      A part of the above i am putting here some of the translated lines from google translator ( though it is not complete translation):-

      “What is the brother Mnjil flop is not far from the torch of his bone piercing through the heart of darkness, you have gone all night suffering of thunder bolt. Key is a balance, a Vidh go across to him, the look, it shines across the temple of love. Fire came so close, the true warrior is not dead brother sat! Destination is not far off. Acquired lump turned towards virtue – light your, anal been written – the history of your characters. The soil drank the blood, the flower to feed, Amber Chhaaga a sigh you turn on the cube. Take more tests, god is not cruel to so. I sat dead brother! Destination is not far off.”


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